बल
पत्थर तोड़ कर टूट चुके हाथ
कैसे उठाएंगे कोई झंडा ?
कैसे लिखेंगे
सफ़ेद काग़ज़ों पर अर्ज़ियाँ
कालिख मली उंगलियों से ?
विस्थापित किए गए लोग
कहाँ मिलें,
और कहाँ बनेगा उनसे कोई संगठन ?
ये सोचते हुए
एक हांफते, हताश मरीज़ से
मैं झुंझलाकर पूछता हूँ –
“क्या भूख परेशान नहीं करती?
क्यों नहीं मांगते अपना हक ?
तरीके हैं तो लड़ने के,
लड़ना नहीं चाहते?”
वो नहीं दे पाता कोई जवाब
लेकिन देता है मुझे
थकी आँखों का निर्वात
जिसमें कौंधते है कुछ और सवाल…
के खाँसते हुए लोग
कैसे गायेंगे आंदोलन के गीत ?
पहले से भूमिहीन
कहाँ देंगे धरना ?
और भूखे लोग,
कैसे जाएंगे भूख हड़ताल पर ?
– विदित
About the Author
Vidit is a Community Health Physician and Poet, who works with Mine Workers and Migrant Populations in Rajasthan and Chhattisgarh.